Monday, September 25, 2017

भारत पर अरबो का आक्रमण

मोहम्मद बिन कासिम के नेतृत्व में अरबों ने भारत पर पहला सफल आक्रमण किया ।
अरबों ने सिंध पर 712 ई. में विजय पाई थी ।
अरब आक्रमण के समय सिंध पर दाहिर का शासन था भारत पर अरब वासियों के आक्रमण का मुख्य उद्देश धन दौलत लूटना तथा इस्लाम धर्म का प्रचार प्रसार करना था ।

महमूद गजनी

अल्पतगीन नामक एक तुर्क असरदार गजनी साम्राज्य का संस्थापक था। अलप्तगीन का गुलाम तथा दामाद सुबुक्तगीन था।

महमूद गजनी सुबुक्तगीन का पुत्र था ।उसने पिता के काल में गजनी खुरासान का शासक था ।महमूद गजनी 27 वर्ष की अवस्था में 997 ई. में गद्दी पर बैठा।

बगदाद का खलीफा अलादिर- बिल्लाह  ने मोहम्मद गजनी के पद को मान्यता प्रदान किया ।
से यमीन-उद- दौला तथा यमीन-ऊल-मिल्लाह की उपाधि दी।

महमूद गजनी ने भारत पर 17 बार आक्रमण किया। महमूद गजनी भारत पर पहला आक्रमण 1001ई  में किया था यह आक्रमण शाही राजा जयपाल के विरुद्ध था इसमें जयपाल की पराजय हुई थी।

महमूद गजनी ने 1008 में नगरकोट के विरुद्ध हमले में मूर्ति वाद के विरुद्ध पहेली महत्वपूर्ण जीत बताई थी।
महमूद गजनी ने थानेश्वर के चक्रस्वामीन की कास्य  निर्मित आदमकद मूर्ति को गजनी भेजकर रंगभूमि  में रखवाया था।

महमूद गजनी का सबसे चर्चित आक्रमण 1024 ई में सोमनाथ मंदिर( सौराष्ट्र )पर हुआ था. इस मंदिर की लूट में उसे करीब 2000000 दीनार की संपत्ति हाथ लगी सोमनाथ की रक्षा में सहायता करने के कारण अन्हिलवाड़ा के शासक पर महमूद ने आक्रमण किया।

सोमनाथ मंदिर लूट कर ले जाने के क्रम में महमूद पर जाटों ने आक्रमण किया और कुछ संपत्ति लूट ली थी महमूद गजनी का अंतिम भारतीय आक्रमण 1027 ई. में जाटों के विरुद्ध महमूद गजनी की मृत्यु 1030 में हो गई ।
अलबरूनी , फिरदौसी, उत्बी तथा फारूखी महमूद गजनवी के दरबार में रहते थे।



            मुहम्मद गौरी

गौर , मोहम्मद गजनी के अधीन एक छोटा सा राज्य था । 1173 ई.ं में शहाबुद्दीन मोहम्मद गौरी गौर का शासक बना । इसने भारत पर पहला आक्रमण 1175 ईस्वी में मुल्तान के विरुद्ध किया था ।मोहम्मद गौरी का दूसरा आक्रमण 1178 ई में पाटन (गुजरात) पर हुआ।
वहां के शासक भीम द्वितीय ने गौरी को बुरी तरह परास्त किया ।मोहम्मद गौरी भारत के विजित प्रदेश पर अपने  शासन का भार ने गुलाम सेनापतियों को सौपते हुए गजनी लौट गया ।मोहम्मद गौरी की हत्या  15 मार्च 1206 ई को कर दी गई।

          मुहम्मद गौरी के प्रमुख युद्ध

तराईन का प्रथम युद्ध 1191 ई में गौरी और पृथ्बी राज के बीच हुआ जिसमे पृथ्वीराज की विजय हुयी।

तराईन का द्वितीय युद्ध 1192 ई में हुआ जिसमे पृथ्वीराज की हार हुयी ,

चन्दावर का युद्ध 1194  में गौरी और जयचन्द के बीच हुआ जिसमे गौरी को विजय प्राप्त हुयी।

राष्ट्रकूट वंश

राष्ट्रकूट वंश का संस्थापक दंतिदुर्ग(752ई.) था ।
इसकी राजधानी मनकिर या मान्यखेत ( वर्तमान मालखेड , शोलापुर के निकट) थी।

राष्ट्रकूट वंश के प्रमुख शासक थे
(1) कृष्ण प्रथम

(2) ध्रुव

(3) गोविंद तृतीय

(4) अमोघवर्ष

(5) कृष्ण द्वितीय

(6) इंद्र तृतीय

(7) कृष्ण तृतीय

एलोरा के प्रसिद्ध कैलाश मंदिर का निर्माण कृष्ण प्रथम ने कराया था ।
ध्रुव राष्ट्रकूट वंश का पहला शासक था जिसने कन्नौज पर अधिकार करने हेतु त्रिपक्षीय संघर्ष में भाग लिया और प्रतिहार नरेश वत्सराज एवं पाल नरेश धर्मपाल को पराजित किया ।

ध्रुव को धारावर्ष भी कहा जाता था ।

गोविंद तृतीय ने त्रिपक्षीय संघर्ष में भाग लेकर चक्रायुद्ध एवं उसके संरक्षक  तथा प्रतिहार वंश के शासक नागभट्ट द्वितीय को पराजित किया ।
पल्लव ,पांड्य, केरल एवं गंग शासकों के संघ को गोविंद तृतीय नष्ट किया ।

अमोघवर्ष जैन धर्म का अनुयायी था उसने कन्नड़ में कविराजमार्ग की रचना की ।

आदिपुराण की रचनाकार जिनसेंन,
गणितासार संग्रह के लेखक महावीराचार्य एवं अमोघवृति  के लेखक सक्त्याना अमोघवर्ष के दरबार में रहते थे ।

अमोधवर्ष ने तुंगभद्रा नदी में जल समाधि लेकर अपने जीवन का अंत किया।

इंद्र तृतीय शासन काल में अरब निवासी आलमसुदी भारत आया। इसमें तत्कालीन राष्ट्रकूट शासक को भारत का सर्वश्रेष्ठ शासक कहा ।राष्ट्रकूट वंश का अंतिम महान शासक कृष्ण तृतीय था । इसी के दरबार में कन्नड़ भाषा की कवि पोन्न रहते थे । जिन्होंने शांतिपूराण की रचना की ।

कल्याणी के चालुक्य तैलप- द्वितीय ने 973 ई. में कर्क को हराकर राष्ट्रकूट राज्य पर अपना अधिकार कर लिया और कल्याणी के चालुक्य वंश की नींव डाली।

एलोरा एवं एलीफेंटा महाराष्ट्र वह मंदिरों का निर्माण राष्ट्रकूटों के समय में ही हुआ एलोरा की 34 शैलाकृत गुफाएं हैं जिनमें 1 से 12 तक बौद्धों, 13 से 29 तक हिंदुओं एवं 30 से 34 जैनों की गुफाएं है ।

राष्ट्रकूट ,शैव ,वैष्णव ,शाक्त संप्रदाय के साथ-साथ जैन धर्म के भी उपासक थे। राष्ट्रकूटों ने अपने राज्य में मुसलमान व्यापारियों को बसने तथा इस्लाम का प्रचार करने की स्वीकृति दी।

पल्लव वंश

पल्लव वंश का संस्थापक सिंहविष्णु (575 -600ई) था उसकी राजधानी कांची (तमिलनाडु के कांचीपुरम) थी ।

यह  वैष्णव धर्म का अनुयायी था।
किरातार्जुनीयम के लेखक भारवि सिंहविष्णु के दरबार में रहते थे ।

पल्लव वंश के प्रमुख शासक हुए क्रम-

(1)  महेंद्र वर्मन प्रथम (600 -630 ई.)

(2) नरसिंह सिंह वर्मन प्रथम( 630 668 ई.)

(3) महेंद्र वर्मन द्वितीय (668 से 670)

(4) परमेश्वर वर्मन प्रथम (670-680ई.)

(5) नरसिंह वर्मन द्वितीय (704- 728ई.)

(6)  नंदी वर्मन द्वितीय (731 से 795 ई.)

पल्लव वंश का अंतिम शासक अपराजित ( 879 से 897) हुआ।

मतविलास प्रहसन की रचना महेंद्र वर्मन ने की थी। महाबलीपुरम के एकाश्म मंदिर जिसे रथ कहा गया है का निर्माण पल्लव राजा नरसिंह वर्मन प्रथम के द्वारा कराया गया था ।
रथ मंदिरों में सबसे छोटा द्रौपदी रथ है जिसमें किसी प्रकार का अलंकरण नहीं मिलता।

वातापीकोंड की उपाधि नरसिंहवर्मन प्रथम ने धारण की थी ।अरबों के आक्रमण के समय पल्लवो का शासक नरसिंह वर्मन द्वितीय था ।उसने राजासिंह ( राजाओ में सिंह), आगमप्रिय (शास्त्रों का प्रेमी), शंकरभक्त (भगवान शिव का उपासक )आदि की उपाधि धारण की।

उसने कांची के कैलाशनाथ मंदिर का निर्माण कराया जिसे राजसिद्धेश्वर मंदिर भी कहा जाता है ।इसी मंदिर के निर्माण में द्रविड़ स्थापत्य कला की शुरुआत हुई (महाबलीपुरम में शोर मंदिर)

दशकुमारचरित के लेखक दण्डी नरसिंह वर्मन द्वितीय के दरबार में रहते थे । कांची के मुक्तेश्वर मंदिर तथा बैकुंठ पेरुमल मंदिर का निर्माण नंदी वर्मन द्वितीय ने कराया। प्रसिद्ध वैष्णव संत तिरुमङगई अलवार नन्दी वर्मन के समकालीन थे।

वर्धन वंश

गुप्त वंश के पतन के बाद जिन नए राजवंशों का उदय हुआ उनमे मौखरि, मैत्रक , पुष्यभूतिपरवर्ती गुप्त और गौंड प्रमुख है
इन राजवंशों में पुष्यभूति वंश के शासकों ने सबसे विशाल साम्राज्य स्थापित किया।
पुष्यभूति वंश के संस्थापक पुष्यभूति थे इनकी राजधानी थानेश्वर थी।

प्रभाकरवर्धन  इस वंश की स्वतंत्रता का जन्मदाता था तथा प्रथम प्रभावशाली शासक जिसने परमभटटारक और महाराजाधिराज जैसी सम्मानजनक उपाधि धारण की ।

प्रभाकर वर्धन की पत्नी यशोमती के दो पुत्र राजवर्धन एवं हर्षवर्धन हुए तथा एक कन्या भी जिसका नाम राजश्री था।

राजश्री का विवाह कन्नौज के मौखरि शासक ग्रहवर्मा के साथ हुआ था।
मालवा के शासक देवगुप्त ने वर्मा की हत्या कर दी और राजश्री को बंदी बना लिया । राजवर्धन ने देवगुप्त को मार डाला परंतु उसके  मित्र गौंड नरेश शशांक ने धोखा देकर राज्यवर्धन की हत्या कर दी।

शशांक शैव धर्म का अनुयाई था जिसने बोधि वृक्ष को कटवा दिया ।

राज्यवर्धन की मृत्यु के बाद 606 ई. में  16 वर्ष की अवस्था में राज्यवर्धन थानेसर की गद्दी पर बैठा ।
हर्ष को शिलादित्य के नाम से भी जाना जाता था। जिसने परमभटटारक नरेश की उपाधि धारण की थी।

हर्ष ने शशांक को पराजित करके कन्नौज पर अधिकार कर लिया तथा उसे अपनी राजधानी बनाया।
हर्ष और पुलकेशिन द्वितीय के बीच नर्मदा नदी के तट पर युद्ध हुआ जिसमें हर्ष को पराजय मिली ।

चीनी यात्री हेनसांग हर्षवर्धन के शासनकाल में भारत आया।  इसे यात्रियों में राजकुमार,  निति का पंडित एवं वर्तमान शाक्यमुनि कहा गया।

वह  नालंदा विश्वविद्यालय में पढ़ने एवं बौद्ध ग्रंथ संग्रह करने के उद्देश्य भारत आया था।

हर्ष  ने 641ई.में अपने दूत चीन  भेजें तथा 643 ई. एवं 445 ई में दो  चीनी दूत उसके दरबार में आये । हर्ष ने कश्मीर के शासक से बुद्ध के दांत अवशेष बलपूर्वक प्राप्त किये।

हर्ष के पूर्वज भगवान शिव और सूर्य के अनन्य उपासक थे प्रारंभ में हर्ष भी अपने कुल देवता शिव के परम भक्त था ।
चीनी यात्री ह्वेनसांग से मिलने के बाद उसने बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया।
हर्ष के समय में नालंदा महाविहार महायान बौद्ध धर्म की शिक्षा का प्रधान केंद्र था।
हर्ष के समय में प्रयाग में प्रति पांचवे वर्ष वार्षिक समारोह आयोजित किया जाता था जिसे महामोक्षपरिषद कहा जाता था ।

बाणभट्ट हर्ष के दरबारी कवि थे उन्होंने हर्षचरित एवं कादंबरी की रचना की ।

प्रियदर्शिका रत्नावली तथा नागानंद नाम 3 संस्कृत नाटक ग्रंथों की रचना हर्ष ने की थी कहा जाता है कि धावक नामक कवि ने हर्ष से पुरस्कार लेकर उसके नाम से यह 3 नाटक लिख दिए ।

हर्ष को भारत का अंतिम हिंदू सम्राट कहा गया है लेकिन वह ना तो कट्टर हिंदू था और ना ही सारे देश का शासक है ।

हर्ष के आधिन्स्थ शासक महाराज अथवा महासामंत कहे जाते थे।
मंत्रिपरिषद में मंत्री को सचिव यह कहा जाता था। प्रशासन की सुविधा के लिए हर्ष का साम्राज्य कई प्रांतों में विभाजित था।

प्रांतों को भुक्ति कहा जाता था और प्रतेक भुक्ति का शासक राजस्थानिक , उपरिक ,  कहा जाता था।

हर्षचरित मे प्रांतीय शासक के लिए लोकपाल शब्द आया है भुक्ति का विभाजन जिलों में हुआ था और जिले की संज्ञा विषय थी जिसका प्रधान विषयपति

विषय के  अंतर्गत पाठक (आधुनिक तहसील)होते थे । ग्राम ,शासन की सबसे छोटी इकाई थी ।ग्राम शासन का प्रधान ग्रामाक्षपटलिक कहा जाता था।

पुलिसकर्मियों को चाट या भाट कहा गया है ।
दंडपाशिक तथा दाण्डिक पुलिस विभाग के अधिकारी होते थे ।
अश्वसेना के अधिकारियों को बृहदेश्वर। तथा  पैदल सेना के अधिकारियों को बलाधिकृत तथा महाबलाधिकृत कहा जाता था।

हर्षचरित में सिंचाई के साधन के रूप में तुला यंत्र का उल्लेख मिलता है हर्ष के समय मथुरा सूती वस्त्रो के निर्माण के लिए प्रसिद्ध थी ।

हर्षचरित के अनुसार हर्ष की मंत्री परिषद

भंडी            -   प्रधान सचिव

सिंहनाद       -  प्रधान सेनापति

कुन्तल        - अश्वसेना का प्रधान

स्कन्दगुप्त    -  गज सेना का प्रमुख

Thursday, September 21, 2017

गुप्त साम्राज्य

गुप्त साम्राज्य का उदय तीसरी शताब्दी के अंत में प्रयाग के निकट कौशांबी में हुआ ।

गुप्त वंश का संस्थापक श्री गुप्त (240 -280 ई)था।

।श्रीगुप्त का उत्तराधिकारी घटोत्कच (280-320ई)हुआ।
गुप्त वंश का प्रथम महान सम्राट चंद्रगुप्त प्रथम था।
वह 320 ईस्वी में गद्दी पर बैठा इसने लिच्छवी राजकुमारी कुमार देवी से विवाह किया।
इसने महाराजाधिराज की उपाधि धारण की।

गुप्त संवत (319-320)की शुरुआत चंद्रगुप्त प्रथम ने की।
चंद्रगुप्त प्रथम का उत्तराधिकारी समुद्रगुप्त हुआ जो 335 ईस्वी में राज गद्दी पर बैठा ।
इसने आर्यवर्त के 9  और दक्षिणावर्त के 12 शासको को पराजित किया इन्हीं विजयों के कारण इसे भारत का नेपोलियन कहा जाता है।

समुद्रगुप्त विष्णु का उपासक था ।
समुद्रगुप्त का दरबारी कवि हरिसेण था जिसने इलाहाबाद प्रशस्ति लेख की रचना की ।
समुद्रगुप्त ने अश्वमेधकर्ता की उपाधि धारण की।

समुद्रगुप्त संगीत प्रेमी था ऐसा अनुमान उसके सिक्कों पर वीणा वादन करते दिखाया जाने से लगाया गया है। समुद्रगुप्त ने विक्रमांक की उपाधि धारण की ।
इसे कविराज भी कहा जाता है।

समुद्रगुप्त का उत्तराधिकारी चंद्रगुप्त द्वितीय हुआ जो 380 ईसवी में राज गद्दी पर बैठा।
चंद्रगुप्त द्वितीय के शासनकाल में चीनी यात्री फाह्यान भारत आया ।
शकों पर विजय के उपलक्ष्य में चंद्रगुप्त द्वितीय ने चांदी के सिक्के चलाए ।
चंद्रगुप्त द्वितीय का उत्तराधिकारी कुमारगुप्त प्रथम या गोविंद गुप्ता(415-454ई) हुआ।
नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना कुमारगुप्त ने की थी।
कुमारगुप्त प्रथम का उत्तराधिकारी स्कन्ध गुप्त हुआ स्कन्धगुप्त ने गिरनार पर्वत पर स्थित सुदर्शन झील का पुनरुद्धार गया है ।
स्कंदगुप्त ने पर्णदत्त को स्वराष्ट्र के गवर्नर नियुक्त किया ।
स्कंधगुप्त के शासनकाल में ही हूणों का आक्रमण हुआ था ।

अंतिम गुप्त शासक भानुगुप्त था।

साम्राज्य की सबसे बड़ी प्रादेशिक इकाई देश थी जिसके शासक को गुप्ता कहा जाता था ।
दूसरी प्रदेशिक इकाई भुक्ति थी जिसके शासक को उपरिक कहा जाता था।
भुक्ति के नीचे विषय नाम की प्रशासनिक इकाई होती थी जिसके प्रमुख विषयपति कहलाते थे ।
पुलिस विभाग का मुख्य अधिकारी दंडपाशिक कहलाता था ।

पुलिस विभाग के साधारण कर्मचारियों को चाट एवं भाट कहा जाता था ।
प्रशासन की सबसे छोटी इकाई ग्राम थी और ग्राम का प्रशासन ग्राम सभा द्वारा संचालित होता था । ग्राम सभा का मुख्य ग्रामीण कहलाता था।

एवं अन्य सदस्य महत्तर कहलाते थे । ग्राम समूहो की  छोटी छोटी इकाइयों को पेठ कहा जाता था ।

गुप्त शासक कुमारगुप्त के  दामोदरपुर ताम्रपत में भूमि  विक्री से संबंधित अधिकारियों  के क्रियाकलापों का उल्लेख है।
भू राजस्व उत्पादन का एक चोथाई  भाग से 1/6 भाग होता था।
आर्थिक उपयोगिता के आधार पर निम्न प्रकार की भूमि थी।
(1) क्षेत्र - कृषि योग्य भूमि

(2) वास्तु- वास करने योग्य भूमि

(3) चारागाह भूमि- पशुओ के चारा योग्य भूमि

(4) खिल्य - न जोतने योग्य भूमि

(5) अप्रहत - जंगली भूमि

सिंचाई के लिए रहट या घंटी यंत्र का प्रयोग होता था।
श्रेणी के प्रधान को ज्येष्टक कहा जाता था ।
गुप्त काल में उज्जैन सर्वाधिक महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र था।
गुप्त राजाओं ने सर्वाधिक स्वर्ण मुद्राएं जारी की उनके स्वर्ण मुद्राओं को अभिलेखों में दिनार कहा गया है।
कायस्थों का सर्वप्रथम वर्णन याज्ञवल्क्य स्मृति में है।

जाति के रूप में कायस्थों का सर्वप्रथम वर्णन ओशनम स्मृति में है ।
विन्ध्य जंगल में सबर जाति के लोग अपने देवताओं को मनुष्य का मांस चढ़ाते थे ।पहली बार किसी के सती होने का प्रमाण 510 ईसवी में भानुगुप्त की एरण अभिलेख से मिलता है जिसमें किसी भोजराज की मृत्यु पर उसकी पत्नी के सती होने का उल्लेख है।

गुप्तकाल में वेश्यावृत्ति करने वाली महिलाओं को गणिका कहा जाता था वृद्ध वेश्याओं को कुट्ट्नी कहा जाता था ।
गुप्त साम्राज्य वैष्णव धर्म के अनुयाई थे तथा उन्होंने इसी राजधर्म बनाया था विष्णु का वाहन गरुड़ गुप्तो का राजचिन्ह था।
गुप्तकाल में वैष्णव धर्म संबंधित सबसे महत्वपूर्ण अवशेष  देवगढ़ झांसी का दशावतार मंदिर है ।

अजन्ता में निर्मित कुल 29 गुफाओं में वर्तमान में से केवल 6 ही शेष  हैं जिनमें गुफा संख्या 16 एवं 17 ही गुप्तकालीन है ।

इनमें गुफा संख्या 16 में उत्कीर्ण मरणासन्न राजकुमारी का चित्र प्रशंसनीय है ।गुफा संख्या 17 के चित्र को चित्रशाला कहा गया है इस चित्रशाला में बुद्ध की जन्म जीवन महाभिनिष्क्रमण एवं महापरिनिर्वाण की घटनाओं से संबंधित चित्र उदृत किए हैं ।अजंता की गुफाएं बौद्ध धर्म की महायान शाखा से संबंधित है।
गुप्त काल में निर्मित अन्य गुफा बाघ की गुफा है जो ग्वालियर के समीप बाघ नामक स्थान पर विंध्य पर्वत को काटकर बनाई गई थी ।

चंद्रगुप्त द्वितीय के शासनकाल में संस्कृत भाषा का सबसे प्रसिद्ध कवि कालिदास था ।
चंद्रगुप्त द्वितीय के दरबार में रहने वाले आयुर्वेदाचार्य धन्वंतरी थे।
गुप्तकाल में विष्णु शर्मा द्वारा लिखित पंचतंत्र संसार का सर्वाधिक प्रचलित ग्रंथ माना जाता है बाइबल के बाद स्थान दूसरा है इसे पांच भागों में बांटा गया है

(1)मित्रभेद  (2) मित्रलाभ  (3) संधि विग्रह  (4)लब्द प्रणाश  (5) अपरिक्षाकारित्व

आर्यभट्ट ने आर्यभट्टीयम एवं सूर्य सिद्धांत नामक ग्रंथ लिखे ।
इसी ने सर्वप्रथम बताया कि पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमती है

चंद्रगुप्त द्वितीय के दरबार में रहने वाले कुछ प्रमुख विद्वान थे
(1)आर्यभट्ट
(2) वराह मिहिर
(3)धन्वंतरि
(4)ब्रम्हगुप्त

पुराणों की वर्तमान रूप की रचना गुप्त काल में हुई इसमें ऐतिहासिक परंपराओं का उल्लेख है।
गुप्त काल के चाँदी के सिक्कों को रुप्यका कहा जाता था ।
याज्ञवल्क्य भारद्वाज एवं वृहस्पति स्मृतियों  की रचना गुप्त काम में हुई थी ।
मंदिर बनाने की कला गुप्तकाल में ही विकसित हुयी थी सांस्कृतिक उपलब्धियों के कारण गुप्त काल को भारतीय इतिहास श्वर्ण काल कहा जाता है।

Wednesday, September 20, 2017

कुषाण

पहलव के बाद कुषाण आये  जो यूची एवं तोखरी भी कहलाते हैं। युची नामक एक कबीला पांच कुलो में बंट गया था ।उन्हीं में एक कुल के थे  कुषाण

कुषाण वंश का संस्थापक कुजुल केदिफीसेसे था इस बंश का सबसे प्रतापी राजा कनिष्क था उसकी राजधानी पुरुषपुर  या पेशावर थी  कुषाणो की द्वितीय राजधानी मथुरा थी।

कनिष्क ने 78 ई एक सम्वत  चलाया जो सक सम्वत कहलाया  जिसे भारत सरकार द्वारा प्रयोग में लाया जाता है।

बौद्ध धर्म की चौथी बौद्ध संगीति कनिष्क के शासनकाल में कुंडलवन कश्मीर में प्रसिद्ध बौद्ध विद्वान वसुमित्र की अध्यक्षता में हुआ।

कनिष्क बौद्ध धर्म के महायान संप्रदाय का अनुयाई था ।

आरंभिक कुषाण शासको में भारी संख्या में स्वर्ण मुद्राएं जारी की जिनकी शुद्धता गुप्त काल स्वर्ण मुद्राओं से उत्कृष्ट है ।

कनिष्क का राजवैध आयुर्वेद  विद्वान चरक था जिसने चरक संहिता की रचना की।
महाविभाष सूत्र के रचनाकार वसुमित्र हैं इसे ही बौद्ध धर्म का विश्वकोश कहा जाता है ।

कनिष्क के राज्य कवि अश्वघोष न्र  बौद्धों का रामायण बुद्धचरित की रचना की।

वसुमित्र ,पार्श्व , नागार्जुन , महाचेत  एवं संघरक्ष कनिष्क के दरबार के विभूति थे ।  भारत का आइंस्टीन नागार्जुन को कहा जाता है उनकी पुस्तक माध्यमिक सूत्र है ।

कनिष्क की मूर्ति  मृत्यु 102 ई  में हो गई । कुषाण  वंश का अंतिम शासक वासुदेव था  गंधार शैली और मथुरा शैली का विकास कनिष्क के शासन काल में हुआ ।
रेशम मार्ग पर नियंत्रण रखने वाले शासको में सबसे प्रसिद्ध कुषाण थे ।रेशम  बनाने की तकनीक का आविष्कार सबसे पहले चीन में हुआ।

शक

यूनानियों के बाद शक आए । शको की 5 शाखाएं थी। और हर शाखा की राजधानी भारत औरअफगानिस्तान के अलग-अलग भागों में स्थित थी।

पहली शाखा ने अफगानिस्तान

दूसरी शाखा ने पंजाब

तीसरी शाखा नियम मथुरा

चौथी शाखा ने पश्चिमी भारत

पांचवी शाखा ने उत्तरी दक्कन पर प्रभुत्व स्थापित किया ।

शक मूलत: मध्य एशिया  के निवासी थे  जो चारागाह की खोज में भारत आए।

58 ईसवी पूर्व में उज्जैन के एक स्थानीय राजा ने शको को पराजित कर  के बाहर खदेड़ दिया और विक्रमादित्य की उपाधि धारण की ।

शको पर विजय के उपलक्ष्य में 58 ई. पूर्व में एक नया संवत विक्रम संवत के नाम से प्रारंभ हुआ ।

इसी समय से विक्रमादित्य एक लोकप्रिय उपाधि बन गई जिनकी संख्या भारतीय इतिहास में 14 तक पहुंच गई ।

गुप्त सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय सबसे अधिक विख्यात विक्रमादित्य थे।

शको  की अन्य शाखाओं की तुलना में दक्षिण भारत में प्रभुत्व स्थापित करने वाली शाखा ने सबसे लंबे अरसे तक शासन किया। ( 400 सालो तक )

गुजरात में चल रही समुद्री व्यापार से यह शाखा काफी लाभवानित हुई । और  भारी संख्या में चांदी के सिक्के जारी किए।

शकों का सबसे प्रतापी शासक रुद्रदामन प्रथम था , जिसका शासन (130 से 150 ईसवी )  गुजरात के बड़े भाग पर था ।

उसने काठियावाड़ की अर्द्धशुष्क  सुदर्शन झील (मौर्य द्वारा निर्मित ) का जीर्णोद्धार कराया।

रुद्रदामन संस्कृत का बड़ा प्रेमी था उसने ही सबसे पहले विशुद्ध संस्कृत भाषा में लम्बा  अभिलेख (गिरनार अभिलेख ) जारी किया जिसके पहले के सभी अभिलेख प्राकृत भाषा में रचित है भारत में शक राजा अपने को क्षत्रप कहते थे।